हिंदी कविता

खुदसे यु कहता यही

खुदसे यु कहता यही
राह से भटके नही
पाप को पुण्य से
परास्त होना यही

समय के चक्र में
दौडती ये जिंदगी
भटके रास्तों पर
मंजीले मिलती नहीं

ध्येय

तु चाहे जितनी जिद कर
कुछ पाने की कोशिश कर
मिलता नसीब में लिखकर
ज्यादा मिला उसे बांटकर
कम मिला खुश होकर
जिना सीख कर्म कर

खुशियाँ

खुशीयां मिलीं थी परसो
सबका हाल पुछ रही थी
दरवाजे पें हसते
परेशानी को देख रही थी

दिया था सबकुछ
फिर क्या कमी थी
आज अपनोके संग
मेरी भी कमी थी

संहार

दुर्जनोंका संहार करू
ना युही सहता रहू

राह के पथ्थर वही
ना युही देखता रहू

सब्र की सीमा वही
ना युही बैठा रहू

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