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आरजु

“दुआयें मांगी थी
मिन्नतें मांगी थी
भगवान के दर पे
सब बातें कही थी

फिर भी न कोई आवाज
ना कोई मदत मिली थी
पत्थर दिल है भगवान
सच्ची आरजू न सुनी थी

न सोना ना चांदी
ऐसी मिन्नतें नहीं थी
अपने बस मिल जाये
एक ख्वाहिश यही थी

फिर क्यों मिल गये
अधुरी जिनकी साथ थी
अपने न मिल पाए कही
दुआयें मेरी बेअसर थी

एक शिकायत तुझसे यही
मन से जो कही थी
तु तो ना बन पत्थर दिल
एक आरजु यह थी!!”

-योगेश खजानदार

Yogesh khajandar

लेखक

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