खुशियाँ

“खुशीयां मिलीं थी परसो
सबका हाल पुछ रही थी
दरवाजे पें हसते
परेशानी को देख रही थी

दिया था सबकुछ
फिर क्या कमी थी
आज अपनोके संग
मेरी भी कमी थी

छोड मेरा साथ
मंजिले भी मिली थी
परेशानी थी वहा
अहंकार से खडी थी

खुशियां मिली थी परसो
सबका हाल पुछ रही थी।”

– योगेश खजानदार

Yogesh khajandar

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