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दोहा

श्री गणपति पद नाय सिर धरि हिय शारदा ध्यान ।
सन्तोषी मां की करुँ कीरति सकल बखान ।

चौपाई

जय संतोषी मां जग जननी, खल मति दुष्ट दैत्य दल हननी ।
गणपति देव तुम्हारे ताता, रिद्धि सिद्धि कहलावहिं माता ॥ १ ॥

माता-पिता की रहौ दुलारी, कीरतिकेहि विधि कहूं तुम्हारी ।
क्रीटमुकुट सिरअनुपम भारी, काननकुण्डल को छवि न्यारी ॥ २ ॥

सोहत अंग छटा छवि प्यारी, सुन्दर चीर सुनहरी धारी ।
आप चतुर्भुज सुघड विशाला, धारण करहु गले वन माला ॥ ३ ॥

निकट है गौ अमित दुलारी, करहु मयूर आप असवारी ।
जानत सबही आप प्रभुताई, सुर नर मुनि सब करहिं बडाई ॥ ४ ॥

तुम्हरे दरश करत क्षण माई, दुख दरिद्र सब जाय नसाई ।
वेद पुराण रहे यश गाई, करहु भक्त की आप सहाई ॥ ५ ॥

ब्रह्मा ढिंग सरस्वती कहाई, लक्ष्मी रुप विष्णु ढिंग आई ।
शिव ढिंग गिरजा रुप बिराजी, महिमा तीनों लोक में गाजी ॥ ६ ॥

शक्ति रुप प्रगटी जग जानी, रुद्र रुप भई मात भवानी ।
दुष्टदलन हित प्रगटीकाली, जगमग ज्योति प्रचंड निराली ॥ ७ ॥

चण्ड मुण्ड महिषासुर मारे, शुम्भ निशुम्भ असुर हनिडारे ।
महिमा वेद पुरातन बरनी, निज भक्तन के संकट हरनी ॥ ८ ॥

रुप शारदा हंस मोहिनी, निरंकार साकार दाहिनी ।
प्रगटाई चहुंदिश निज माया, कण कण में है तेज समाया ॥ ९ ॥

पृथ्वी सूर्य चन्द्र अरु तारे, तब इन्गीय क्रम बद्ध हैं सारे ।
पालन पोषण तुमहीं करता, क्षण भंगुर में प्राण हरता ॥ १० ॥

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावैं, शेष महेश सदा मन लावे ।
मनोकामना पूरण करनी, पाप काटनी भव बहतरनी ॥ ११ ॥

चित्त लगाय तुम्हें जो ध्याता, सो नर सुख सम्पत्ति है पाता ।
बन्ध्या नारि तुमहिं जो ध्यावैं, पुत्र पुष्प लता सम वह पावैं ॥ १२ ॥

पति वियोगी अति व्याकुलनारी, तुमवियोग अतिव्याकुलयारी ।
कन्या जो कोई तुमको ध्यावै, अपना मनवांछित वर पावै ॥ १३ ॥

शीलवान गुणवान हो मैया, अपने जन की नाव खिवैया ।
विधि पूर्वक व्रत जो कोई करहीं, ताहिअमित सुखसम्पतिभरहीं ॥ १४ ॥

गुड और चना भोग तोहि भावै, सेवा करै सो आनन्द पावै ।
श्रद्धा युक्त ध्यान जो धरहीं, सो नर निश्चय भव सों तरहीं ॥ १५ ॥

उद्यापन जो करहि तुम्हारा, ताको सहज करहु निस्तारा ।
नारि सुहागिन व्रत जो करती, सुखसम्पति सों गोदी भरती ॥ १६ ॥

जो सुमिरत जैसी मन भावा, सो नर वैसो ही फल पावा ।
सात शुक्र जो व्रत मन धारे, ताके पूर्ण मनोरथ सारे ॥ १७ ॥

सेवा करहि भक्ति युत जोई, ताको दूर दरिद्र दुख होई ।
जो जन शरण मात तेरी आवै, ताके क्षण में काज बनावै ॥ १८ ॥

जय जय जय अम्बे कल्यानी, कृपा करौ मोरी महारानी ।
जो कोई पढै मात चालीसा, तापे करहिं कृपा जगदीशा ॥ १९ ॥

नित प्रति पाठ करै इक बारा, सो नर रहै तुम्हरा प्यारा ।
नाम लेत ब्याधा सब भागे, रोग दोष कबहूँ नहीं लागे ॥ २० ॥

दोहा

सन्तोषी मां के सदा बन्दहुँ पग निश वास ।
पूर्ण मनोरथ हों सकल मात हरौ भव त्रास ॥

॥ इती संतोषीमाता चालीसा संपूर्ण ॥